ARYAN SPEAKS: ऐ मेरे घर, तेरी याद बेइन्तहाँ आई …


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दिल ए नादान कल मुहब्बतों का हिसाब करने करने बैठा…

ऐ मेरे घर, तेरी याद बेइन्तहाँ आई …

पता नहीं कब बड़ा होऊँगा मैं… पता नहीं कब ये साली घर की याद आना बंद होगी। दिन भर तो ठीक था…मगर शाम को किसी गली से गुजरते हुए एक जले हुए पटाखे के बारूद की महक ने तबाह कर दिया। फिर से खींच ले गयी बचपन की डाइरी के के किसी भूले हुए पन्ने पर। वो पन्ना जिसपे हमारी तस्वीरें हैं…वही पटाखे छोडते हुए, चाचा के साथ बाज़ार जाते हुए। बाज़ार मे मिल रही हर एक चीज़ को खरीदने के लिए मचलते हुए। पटाखे खरीदना, उन्हे धूप मे सुखाना , दीयों को पानी मे भिगाना, उनमे बाती डालना, मोमबत्तियाँ जलाना….सब याद आया ना उस एक मिनट मे, उस एक पन्ने पर। फिर तो लिखना जरूरी हो गया…भाई हम अकेले क्यूँ झेलें? अब ये तो हिन्दी मे ही लिखना होगा होगा ना…अङ्ग्रेज़ी मे वो मजा ना है।

छोटे थे तो बड़ा मन रहता था त्योहार के काम मे अपना भी योगदान देने का। घर की सफाई मे हम भी बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते थे। बावजूद इसके की बारहाँ बजाय सफाई के गंदगी ही फैला देते थे। अब हाथों और पैरों दम होता नहीं था…और चल देते थे बड़े लोगों से टक्कर लेने समान उठाने के मामले मे। जब अपने हिस्से की तोड़ फोड़ कर चुके होते, और घर के लोग ये बोल देते की बेटा…तुमसे ना हो पाएगा…तो मन मसोस कर हम अपने लायक कोई दूसरा काम खोजने चल देते। मगर काम कोई मिलता नहीं था। वैसे एक काम था। पटाखों की लिस्ट बनाना…इस बार कौन से खरीदने हैं, और कितने खरीदने हैं। एक बार लिस्ट तैयार हो जाए तो फिर हिसाब लगाने की बारी आती। हमारे पास कितने पैसे हैं और पापा से कितने मिलने की उम्मीद है। हर बार ये होता था की पैसे जरा कम ही पड़ जाते थे…अब हमारे पास उतना दिमाग तो हुआ नहीं करता था की महंगाई की दर के हिसाब से पटाखों के दाम मे हुई बढ़ोत्तरी का अंदाजा लगा सकें …. वो तो सीधा पटाखे की दुकान पर ही पता चलती थी। और जब पता चलती थी तो पैरों तले जमीन खिसक जाती थी। सब हिसाब किताब पानी में… वो तो भला कहिए की कोई बड़ा साथ मे होता ही था, वरना रोना तो वो आता था जिसका कोई हिसाब नहीं…भाई साल भर के सपने एक बार मे चूर होते थे।

बाजार जाने का मजा भी अलग ही है। जी नहीं, बाज़ार जाने का मतलब कार मे बैठ कर बजार नहीं जाना। हम एक छोटे शहर के बाशिंदे हैं भाई, हमारे यहाँ पैदल बाज़ार जाया करते हैं। पैदल इसलिए नहीं की हमारे पास गाडियाँ नहीं हुआ करती हैं…पैदल इस लिए की इन दिनों आप बाजार मे गाड़ी चला ही नहीं पाएंगे। बाज़ार मे घुसने से पहले हाथ पैर सीधे कर लें और शरीर से मजबूत हों तभी बाज़ार मे घुसें। हमारे यहाँ छपरा में हमारा पारंपरिक बाजार है गुदरी बाज़ार। उस बाजार मे तीन गलियां हैं…एक में फल और सब्जियाँ मिलती हैं, एक मे कपड़े और एक में किराने के समान। उस बाज़ार की एक खासियत है। शाम के समय किसी एक गली मे घुस जाइए। आकाशवाणी पटना पर अगर कोई गाना चल रहा है, और किसी दुकान के रेडियो पर वो आपको सुनाई दिया तो आगे की हर दुकान पर आपको वही गाना सुनाई देगा। बाज़ार के इस छोर से उस छोर तक डॉल्बी के सराउण्ड साउंड की तरह आपको वही गाना सुनाई देगा…बाजार से आप वो गाना पूरा कर के ही निकलेंगे। सो उस बाज़ार में हर वो चीज़ मिलती है जिसकी दिवाली मे जरूरत पड़ सकती है। कठिन काम हैं उन चीजों को खरीद लेना, भीड़ से लड़ कर , झगड़ कर …हंस कर, मोलभाव के साथ। समझ मे नहीं आता की सारे के सारे लोग एक ही दिन पूरा बाजार खरीदने क्यों निकल पड़ते हैं…

खैर…वो बाज़ार आज भी वैसा ही सजा होगा। आज भी वो दिये वाला बाज़ार के आखरी कोने पर बैठा होगा। शायद दिये का दाम भी बढ़ा हो ….तब तो बीस रुपया सैकड़ा हुआ करता था। दिये मे डालने के लिए लोग वही “धारा” का सरसों तेल खरीद रहे होंगे….मोमबत्तियाँ खरीद रहे होंगे। कोई बच्चा किसी पटाखे की दुकान पर जमीन मे लोट रहा होगा। मलाई बरफ वाला बाज़ार की मुहाने पर बरफ छील रहा होगा । भीड़ तो उमड़ पड़ी होगी …दुकान दार परेशान होंगे। मगर हर चेहरे पर एक मुस्कान जरूर होगी। बच्चे फिर जतन से पटाखे सुखाएंगे … लक्ष्मी गणेश की मूर्तियाँ फिर खरीदीं जाएंगी…झूरियाँ फिर छनेंगी। अफसोस…हम वहाँ न होंगे। हमारा बचपन न होगा। हम पढ़ रहे हैं…इंसान बन रहे हैं।

पता नहीं कहाँ पढ़ा था ….

बचपन की वो अमीरी न जाने कहाँ खो गयी…

वरना बारिश के पानी मे कभी हमारे भी जहाज़ चला करते थे…

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