ARYAN SPEAKS: THE CHICKEN GAATHA..By Virat Sagar.


Jai Ho...

Jai Ho…

(Guest post by Virat Sagar.)

पृथिव्यां त्रिणी रत्नानी कोल्ड्रींक्स,, चिकन, चिकेनभक्षकः …

अर्थात् , पृथ्वी पर केवल तीन ही रत्न हैं- चिकन, कोल्ड्रींक्स और चिकन खाने वाले |

मुर्गे का महत्व बताना तो सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| परंतु, एक तुच्छ प्रयास…

हमारे दिन की शुरुआत ही परम पूजनीय श्रीमान मुर्गा जी की बांग के साथ होती है और रात्रि के अंतिम प्रहर तक उसी कुल का कोई ना कोई प्राणी  अपना जीवन त्याग कर किसी मानव की क्षुधा शांत कर उसे योगमाया (निद्रा ) की शरण में भेज देता है| वो स्वर केवल मुर्गे की बांग नही है, वो पांचजन्य की हुंकार, गांडीव की टंकार और अनंतविजय की ललकार है जो प्रभात वेला में हमें हमारी कर्मभूमि में आमंत्रित करती है| सूर्य को उदित होने का निमंत्रण और रात्रि को जाने का आदेश है वो बांग,  शतदल के खिलने का और भ्रमर के गुंजन का आधार है वो बांग,  विहगों के गान और अरुणिमा के आगमन का विधान है वो बांग|

मुर्गा तो स्वयं पक्षी सम्राट है, मुर्गे के सर की कल्गी उसके सर पर परमपिता का प्रदत्त ताज है| प्रकृति ने तो स्वयं ही शीश से पुच्छ तक मुर्गे का शृंगार किया है| मस्तक का मुकुट और लहराती हुई पुंछ सुंदरता की ऐसी भंगिमाएँ प्रस्तुत करते हैं जिनके सामने स्वर्ग की अप्सराएँ भी श्री हीन प्रतीत होती हैं| मुर्ख तो वह मूढ़ मनुष्य हैं जिन्होंने मयूर जैसे कर्महीन प्राणी को पक्षी सम्राट घोषित किया है। मुर्गे की महिमा तो ऐसी है की किसी भी देवता ने उसे अपना वाहन बनाने का साहस तक नही किया|
मुर्गे का तो समस्त जीवन ही कर्मयोग का ज्वलंत उदाहरण है|स्वयं अभावों में जीकर, कीड़े- मकोड़ो का भक्षण करने के बाद भी यह निस्वार्थ प्राणी मुर्गा मानव के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है| मुर्गे का संपूर्ण जीवन ही त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति है| मुर्गा तो वह धर्मात्मा प्राणी है जो मानव सेवा के लिए अपने अजन्मे बालकों तक का बलिदान कर देता है| वह तो जन्मपर्यंत ही कभी बाय्ल्ड, कभी ओमलेट, कभी एगरोल तो कभी चिकेन करी के पीसेज बन उस परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं को भी दुर्लभ है|
वर्षों की भागीरथ तपस्या के पश्चात मानव मात्र की निःस्वार्थ एवं निष्कंटक सेवा के लिए ब्रह्मज्ञ  ऋषि-मुनि देव दुर्लभ मुर्गा योनि को प्राप्त होते हैं|  मुर्गा योनि मे मानव कल्याण के लिए प्राणोत्सर्ग १०० अश्वमेध का फल देने वाला होता है|

परित्रनाय बुभुक्टनाम विनाशाय च कष्टानाम

लोक कल्याणार्थयः कुक्कट्योन्यस्ती कलियुगे||

अर्थात, भूखों के कल्याण, कष्टों के विनाश एवं जन कल्याण के लिए इस कलयुग में एक मुर्गा योनि ही है|
जब तलने के लिए मुर्गे को तेल में समर्पित किया जाता है तो उससे उठने वाला स्वर मानो ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने अपने आलाप को तार सप्तक तक पहुचा दिया हो और जैसे जैसे पीसेज की संख्या बढ़ती जाती है, वह पूरी पाक प्रक्रिया हीं  स्वरमण्डल की भाँति नवीन स्वरों का उत्सर्जन करती है|

और पीसों में सर्वोत्तम लेग पीस का तो वर्णन भी दुष्कर है, संपूर्ण अलंकारशाष्त्र  विफल है | उसे खा कर मिलने वाले आनंद की तुलना केवल बैकुंठ के सुख से ही की जा सकती है| वही आनंद जो सचिन की लेग ग्लॅन्स देखकर अनुभव होता है|मुर्गे का पैर तो आत्मनियंत्रण का उदाहरण है| पंख होने के बाद भी यह विनीत प्राणी उड़ने की बजाय धरती पर चलना पसंद करता है|धरती माता से ऐसा प्रेम और नम्रता का ऐसा उदाहरण मृत्युलोक में दुर्लभ है|उस भुने हुए लेग पीस की सुंदरता तो देखिए जैसे विधाता ने अपना समस्त शिल्प ज्ञान उडेल कर रख दिया हो| उपर की तरफ मोटा गूदेदार और नीचे की तरफ पतला होता हुआ लेग पीस वयुगतिकि (aerodynamics) का सर्वोत्तम उदाहरण पेश करता है| इन सुंदर पैरों पर चलता हुआ मुर्गा निश्चय हीं धरती की शोभा बढ़ने वाला प्रतीत होता है|मुर्गे की उस चाल के समक्ष तो बड़े-बड़े नर्तकों का नृत्य भी कुछ नहीं|

मुर्गा भक्षण तो बालकों और युवाओं के लिए विशेष लाभप्रद है| मुर्गा भक्षण से बालकों की वृद्धि ठीक वैसे ही होती है जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ वृद्धि को प्राप्त होता है|
जैसा की कवि कहते हैं-

पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लोहे से भुजदंड अभय

नस नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय||

और इस लक्ष्य की प्राप्ति का बस एक ही उपाय है- मुर्गा भक्षण| इतिहास साक्षी है की युवाओं के विकास में मुर्गे का योगदान अतुलनीय है| स्वयं गाँधी जी को भी ज्ञान की प्राप्ति मुर्गा खा कर ही हुई थी और उनके अंदर प्रादुर्भाव हुआ था सत्य की शक्ति का|सत्य की उसी शक्ति ने दिलाई थी भारत को स्वंत्रता | इस अमूल्य योगदान के कारण मुर्गा तो राष्ट्रीय पकवान घोषित हो जाना चाहिए| परंतु, मुर्गा इतना निःस्वार्थ प्राणी है की आज तक किसी भी मुर्गे ने इसके लिए आवाज़ तक नही उठाई| प्रणाम है मुर्गे की ऐसी देश भक्ति को|

जब कहीं से गुज़रते हुए सहसा मुर्गा बनाए जाने की सुगंध हमारे नासिका तक पहुँचती है, रोम-रोम पुलकित हो उठता है, मान का मयूर नाच उठता है| मुर्गे के स्वाद रूपी अमृत के समक्ष तो स्वर्ग के भोग भी व्यर्थ हैं|

 आपी स्वर्ग भोगानां न मे मित्रम  रोचते
मार्त्यलोके कुक्कुट भोजनाम स्वर्ग भोगो आपी गरियासी|

अर्थात, हे मित्र! मुझे स्वर्ग के भोग पसंद नही हैं, क्यूंकी धरती पर मुर्गे के भोजन के सामने स्वर्ग के पकवान भी व्यर्थ हैं|
जब तक मुर्गों का अस्तित्व है, उनका भक्षण धरती पर ही स्वर्ग का अनुभव देने वाला है|
मुर्गे का अपमान तो ईश्वर शिल्प का अपमान है,अपमान है मुर्गे के त्याग और कर्त्व्यपरायणता का| मुर्गे का अपमान करने वाले को तीनों लोकों में कहीं श्रण नही मिलती|मुर्गे को हीन समझने वालों के इह लोक और परलोक दोनों का नाश हो जाता है| मुर्गे का अपमान तो निमंत्रण है शनि की वक्र दृष्टि को, यम के पाश को| मुर्गे का भक्षण करने का सीधा तात्पर्य है उस महान  जीव की आत्मा को को स्वर्ग लोक के मार्ग पर भेजना। यह पुण्य  का काम एक राजसूय व दस अश्वमेध यज्ञों का फल  देता है. अर्थात जो मूढ़ प्राणी मुर्गा भक्षण नहीं करता , वो इस पुण्य प्रताप से सर्वथा वंचित रह जाता है।
मानवमात्र  के मनोरंजन के लिए यह महान  जीव ‘ कुक्कुट युद्धों’ में अपने स्वामी की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए  अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर देता है| स्वामी भक्त ऐसे जीव तथा उसके त्याग एवं समर्पण की भावना को बारंबार प्रणाम है|
संभवतः उपरोक्त कारणों से हीं हमें बाल्यकाल से ही विद्यालय एवं घर सभी जगह मुर्गा बनाकर सेवा और त्याग की शिक्षा देने का प्रयास किया जाता है|

धन्य हैं श्रीमान मुर्गा एवं धन्य हैं मुर्गा खाने वाले…
अब तो प्रभु से मेरी एक ही प्रार्थना है-

  न तू अहम कामये राज्यम न स्वर्गम न पुनर्भवम
          कामये मानावसेवार्थम कुक्कुट कूले मम जन्‍मम||

अर्थात, ना तो मुझे राज्य चाहिए, ना स्वर्ग ना हीं मोक्ष|मुझे तो बस मानावसेव के लिए मुर्गे के कुल में अगला जन्म चाहिए.

Written by – Virat Sagar and Giridhar Parthsarathi.

Origianl Concept- Giridhar Parthsaarathi.

( It takes a lot to give people a healthy and genuine smile. Awesome satire. And all things apart….awesome Hindi. I am proud that still there are some young minds in our generation who have such knowledge and respect for their mother-tongue. This blog is from the best Hindi hands of my college, Virat being even a step ahead, all the Sanskrit shlokas are creations of his own…and I will try to post more articles written by them, on more serious topics.

Keep reading.

– Vivek Aryan.)

8 thoughts on “ARYAN SPEAKS: THE CHICKEN GAATHA..By Virat Sagar.

  1. For the first time i comment as a reader…and it feels really nice!! Virat….thankew buddy, for adorning my blog. Giridhar….thanks for being a worthy foe, and always coming up with genuine ideas. The first line that you spoke yesterday….sare rishi muni mar ke murga bante honge sent me in giggles. And now this post, its awesome…loved your hindi, loved its flow, loved the words and most importantly, loved the smile on my face while reading it…
    I beg you to keep writing for this poor blog…

  2. nice work Virat and Co. Virat has always been a Sanskrit lunatic since his school days. Being his school friend , I have seen him eating Sanskrit ,playing Sanskrit and at times even farting Sanskrit.

  3. शब्दो के सही प्रयोग।
    कई उपमाए बहुत सुन्दर है।
    उम्दा,बेहद उम्दा!!

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